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सेब का साम्राज्य डगमगाया: हिमाचल के किसानों ने परसिमन की ओर क्यों किया रुख?

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध सेब अब एक नई चुनौती का सामना कर रहे हैं। कुल्लू घाटी में किसान तेजी से सेब के बागों को परसिमन में बदल रहे हैं। यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तन और बेहतर आर्थिक संभावनाओं के कारण हो रहा है। एक दशक में परसिमन का रकबा और उत्पादन दोगुने से अधिक हो गया है।

कुल्लू के किसान सचिन ठाकुर के परिवार के पास पहले एक हजार से अधिक सेब के पेड़ थे। आज केवल 200 से 300 पेड़ बचे हैं। उनका 8 हेक्टेयर का बाग अब एक हजार परसिमन के पौधों से भर गया है। यह फसल अक्टूबर से जनवरी तक केवल तीन महीने चलती है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर देती है।

क्यों पसंद कर रहे हैं किसान परसिमन?

परसिमन की खेती मुख्य रूप से कुल्लू तक सीमित थी, लेकिन अब यह मंडी जैसे पड़ोसी जिलों में भी फैल रही है। इस फल की मांग केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और कोलकाता जैसे बड़े बाजारों से आती है। सेब की तुलना में परसिमन कम देखभाल मांगता है और गर्म जलवायु में अधिक टिकाऊ साबित हुआ है।

राज्य बागवानी विभाग के उपनिदेशक राज कुमार के अनुसार, तापमान परिवर्तन के दबाव के कारण परसिमन को फसल विविधीकरण के विकल्प के रूप में पेश किया गया। इसका छोटा फसल चक्र, बेहतर दाम और बढ़ती घरेलू मांग ने इसे किसानों के लिए आकर्षक बना दिया। पूर्वी एशिया में उत्पन्न यह फल कम पानी में उगता है और जल्दी आमदनी देता है।

कैसे बदल रही है आर्थिक तस्वीर?

परसिमन किसानों के लिए आर्थिक संकट से उबरने का माध्यम बना है। लुग वैली के चुरला गांव में कई किसान करोड़पति बन गए हैं। यहां के किसान अब नई इमारतों में रहते हैं और अपने बच्चों को दिल्ली-चंडीगढ़ के कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं। एक किसान गोपाल कृष्ण के अनुसार, परसिमन का एक खराब साल भी सेब के अच्छे साल से अधिक लाभदायक होता है।

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उनके चार हेक्टेयर के बाग में पहले 800 सेब के पेड़ थे, जो अब 1300 परसिमन पौधों में बदल गए हैं। पिछले सत्र में उन्होंने 60 लाख रुपये का कारोबार किया, जिसमें से केवल 4-5 लाख रुपये लागत में गए। शेष शुद्ध लाभ था। यह आय सेब की खेती से मिलने वाली आमदनी से कहीं अधिक है।

शहरी बाजार और स्वास्थ्य लाभ

परसिमन ने शहरी भारत को तेजी से आकर्षित किया है। इम्युनिटी बढ़ाने, पाचन में सुधार और कोलेस्ट्रॉल कम करने जैसे स्वास्थ्य लाभों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई है। पोषण विशेषज्ञ निदा फातिमा हजारी के अनुसार, एक परसिमन में सेब से अधिक विटामिन सी और केले से अधिक फाइबर होता है। यह कैलोरी में कम और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है।

रेस्तरां के मेन्यू में भी इस फल ने जगह बनाई है। शेफ इसका उपयोग सलाद, डेजर्ट, सॉस और यहां तक कि आइसक्रीम में कर रहे हैं। गुरुग्राम के ओमो कैफे की हेड शेफ चेतना चोपड़ा परसिमन के साथ फर्मेंटेड ड्रिंक्स तैयार कर रही हैं। उनका मानना है कि यह फल आज के डाइनर्स की मौसमी और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में रुचि के अनुरूप है।

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बढ़ता उत्पादन और चुनौतियां

राज्य में परसिमन का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2013-14 में 403 हेक्टेयर से 519 मीट्रिक टन उत्पादन होता था। 2022-23 तक यह बढ़कर 624 हेक्टेयर और 1201 मीट्रिक टन हो गया। इस वर्ष उत्पादन 1400 मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। कुल्लू जिला अकेले राज्य के कुल उत्पादन का 90 प्रतिशत हिस्सा देता है।

हालांकि, किसानों को कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। राज्य में प्रोसेसिंग सुविधाओं की कमी एक बड़ी समस्या है। चुरला गांव में ही प्रति सीजन लगभग एक हजार पेटी परसिमन केवल अधिक पक जाने के कारण बर्बाद हो जाती है। किसानों का दावा है कि बागवानी विभाग ने इस फसल के विकास में कोई विशेष भूमिका नहीं निभाई।

सेब के सामने क्या हैं समस्याएं?

पर्यावरणविद गुमान सिंह बताते हैं कि बढ़ते तापमान के कारण अब 6000 फीट से नीचे सेब के पेड़ नहीं टिक पा रहे। पहले ये पेड़ 3000 से 6000 फीट की ऊंचाई पर अच्छी पैदावार देते थे। बढ़ती लागत और कीटों के प्रकोप ने भी निचले इलाकों के किसानों को सेब से दूर किया है।

सेब के पेड़ों को नियमित दवाइयों, खाद और छंटाई की आवश्यकता होती है। वहीं परसिमन में कम देखभाल में अच्छी पैदावार मिल जाती है। ठाकुर के अनुसार, आज परसिमन के बाग ठेकेदारों को आसानी से लीज पर मिल जाते हैं, जबकि सेब के बागों के लिए खरीदार ढूंढना मुश्किल होता है। यही आर्थिक तर्क किसानों के निर्णय को प्रभावित कर रहा है।

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