चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल, देश ने क्या खोया क्या पाया- एक विश्लेषण

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World News: 1 जुलाई को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को स्थापित हुए 100 साल होने वाले हैं, लेकिन इसका जश्न मनना चीन में 28 जून से ही शुरू हो गया. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीजिंग के बर्ड्स नेस्ट नेशनल स्टेडियम में 100 वर्ष पूरे होने की खुशी में आधिकारिक समारोह की शुरुआत करते हुए 29 पार्टी मेंबरों को ‘पार्टी में उत्कृष्ट योगदान’ के लिए पुरस्कृत किया. जब चीन कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल होने का जश्न मना रहा है तो ये सवाल जरूर उठता है कि पार्टी के शासनकाल में चीन ने क्या खोया और क्य पाया?मंगलवार 28 जून को नवस्थापित ‘1 जुलाई मेडल’ प्राप्त करने वालों में तिब्बत और शिंजियांग के अशांत प्रांतों के कई सैनिक और अधिकारी शामिल हैं.

सेलिब्रेशन मोड में आते हुए चीनी मीडिया 1 महीने से पिछले 100 साल को ‘गरीबी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई’ के रूप में प्रदर्शित कर रही है. वहां तमाम टेलीविजन नेटवर्क CPC के शताब्दी समारोह से संबंधित डॉक्यूमेंट्री और ड्रामा दिखा रहे हैं. वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के काल में देश की उपलब्धियों को समारोहों में असमान रूप से ज्यादा कवरेज मिल रही है.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल: किन परिस्थितियों में हुई थी स्थापना

1917 के रूसी क्रांति से प्रभावित होकर जुलाई 1921 में मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांत पर आधारित चीनी कम्युनिस्ट पार्टी(CPC) की स्थापना हुई(पहली सामुहिक बैठक). उस समय चीन के एक हिस्से पर राष्ट्रवादी पार्टी,कुओमितांग का शासन था तो दूसरे हिस्से पर डॉ. सनयात सेन के नेतृत्व में CPC का.

1923 में डॉ.सेन ने रूसी कम्युनिस्ट सरकार के साथ संधि कर गणतांत्रिक सरकार बनाने का प्रयास किया लेकिन 1925 में उनकी मृत्यु हो जाने के कारण यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सका. कम्युनिस्ट पार्टी और इसके प्रतिद्वंदी कुओमितांग के बीच तनाव गृह युद्ध में बदल गया जिसमें 1949 में कम्युनिस्टों की जीत हुई.1970 के दशक के अंत में मार्केट रिफॉर्म के बावजूद आधुनिक चीन क्यूबा, उत्तर-कोरिया और लाओस की तरह लेनिनवादी राजनीति व्यवस्था के साथ बना रहा. पार्टी के तीन आधार हैं-लोगों पर नियंत्रण,नैरेटिव पर नियंत्रण और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी(PLA). पार्टी के आर्म्ड विंग के रूप में PLA का मुख्य उद्देश्य पार्टी के शासन और उसके हितों की रक्षा करना है.

100 साल में चीन कहां से कहां पहुंचा?

चाहे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को स्थापित हुए 100 साल हो गए हो या माओ के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार को स्थापित हुए 72 साल, लेकिन चीन का आर्थिक एवं ग्लोबल पावर के रूप में उभार पिछले 40 सालों में ही हुआ है. 1978 में चीन ने मार्केट रिफॉर्म को अपनाया था.

आज से 40 साल पहले चीन का प्रति व्यक्ति आय ‘सब-सहारा अफ्रीकी देशों’ के मुकाबले एक-तिहाई से भी कम था.लेकिन वर्तमान में चीन अमेरिका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. नॉमिनल बेसिस पर अमेरिका की अर्थव्यवस्था चीन से 6 ट्रिलियन डॉलर ज्यादा है लेकिन ‘परचेजिंग पावर पैरिटी'(PPP) के आधार पर चीन ने 2017 में ही अमेरिका को पीछे छोड़ दिया था.

चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस है.चीन पिछले 11 वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा निर्माता देश है. 2019 में चीन ने ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का लगभग 28.7% उत्पादित किया था.यह अमेरिका से 10% से भी अधिक है.चीन ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर द्वारा 2019 में 4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का उत्पादन किया था. अगर भारत से तुलना करें तो भारत ने 2019 में विश्व के मात्र 3.1% उत्पादों का मैन्युफैक्चरिंग किया था.

BAV ग्रुप और यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया द्वारा की गई स्टडी ‘2021 बेस्ट कंट्री रैंक’ के मुताबिक चीन रूस को पछाड़ते हुए आज विश्व का दूसरा सबसे शक्तिशाली देश है.2019 में चीनी वित्त मंत्रालय के अनुसार आधिकारिक तौर पर उसने मिलिट्री बजट के लिए 177 बिलियन डॉलर का आवंटन किया था .चीन के के पास मिलिट्री मैनपावर के रूप में 21.83 लाख एक्टिव सैनिक जबकि 5.1 लाख रिजर्व ट्रूप मौजूद हैं. उसके पास 35000 टैंक, 35000 आर्म्ड वेहिकल्स, 2650 रॉकेट प्रोजेक्टर और 320 न्यूक्लियर बॉम्ब हैं.

आर्थिक स्तर पर इतनी तरक्की कैसे?

  • हर कीमत पर राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना
  • जमीनी स्तर पर, बॉटम-अप्स सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना ( फाइनेंस सेक्टर के बजाय कृषि क्षेत्र में सुधार से शुरुआत)
  • ग्रामीण उद्योग के विकास के लिए नयी तकनीक का इंतजार नहीं किया,मौजूदा तकनीक की सहायता से ही उसको बढ़ावा
  • मशीनरी के आदान-प्रदान के लिए केवल प्राकृतिक संसाधनों के बजाय विनिर्मित वस्तुओं का प्रयोग करना
  • बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भारी सरकारी सहायता प्रदान करना
  • एक साथ ज्यादा निजीकरण करने की जगह सरकारी और निजी स्वामित्व की दोहरी प्रणाली का पालन करना
  • उद्योगों को उपभोक्ता वस्तु से भारी उद्योग ,श्रम से पूंजी प्रधान ,मैन्युफैक्चरिंग से वित्तीय पूंजीवाद और ‘उच्च बजट वाले राज्य’ से ‘उपभोक्ता कल्याणकारी राज्य ‘की ओर बढ़ाना.
  • चीन के राष्ट्रीय बैंक- पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना- वहां की मुद्रा युआन के मूल्य पर कड़ा नियंत्रण रखता है. वह अमेरिकी निर्यात की कीमतों को मैनेज करने के लिए ऐसा करता है. इससे अमेरिका में उत्पादित वस्तुओं की कीमत की तुलना में चीनी वस्तुओं की कीमत कम होती है. चीन अपने विनिमय दर का प्रबंधन करके इस असमानता का फायदा उठाता रहा है.
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ग्लोबल पावर बनने की क्या कीमत चुकानी पड़ी?

2015 में वाइल्ड लाइफ फेडरेशन(WWF) की ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट’ के मुताबिक 1970 से 2015 के बीच चीन में मौजूद टेरेस्ट्रियल वर्टेब्रेट ( स्थलीय केशेरुक) की संख्या आधे से कम रह गई थी जबकि चीन का इकोलॉजिकल फुटप्रिंट दुगुने से भी ज्यादा हो गया. मानव गतिविधियों और विकास के साथ ही पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के हैबिटेट (पर्यावास) की हानि और प्रकृति का क्षरण हुआ है. इससे जैव-विविधता पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ा.मैक्रो लैम्बर्टिनी,डायरेक्टर जनरल,WWF इंटरनेशनल”दुनिया की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में चीन वैश्विक स्थिरता और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हम सभी जुड़े हुए हैं और सामूहिक रूप से हमारे पास उन संसाधनों को खोजने और अपनाने की क्षमता है जो हमारे एकमात्र ग्रह के भविष्य की रक्षा करें”

चीन पर अपने आर्थिक विकास के लिए अल्पसंख्यकों एवं आम नागरिकों के मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगता रहा है. कुछ ‘रिहा’ हुए उइगर बंदियों के अनुसार शिंजियांग के अंदर और बाहर कारखानों और खेतों में काम करने के लिए उन्हें मजबूर किया जाता था. जबकि दूसरी तरफ चीनी अधिकारी इसे ‘गरीबी उन्मूलन’ प्रयास के रूप में वर्णित करते हैं.

फरवरी 2021 में एक ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक ने 32 ग्लोबल ब्रांडों की एक सूची जारी कि जो चीन के ऐसे कारखानों से प्रोडक्ट प्राप्त करते हैं जहां शिनजियांग प्रांत के श्रमिकों का उपयोग जबरन श्रम के रूप में होता है.

क्या यह ग्रोथ बना रहेगा? चीन के समक्ष मौजूद चुनौतियां

चीन के आर्थिक विकास के समक्ष सबसे बड़ी समस्या उसकी तेजी से उम्रदराज होती जनसंख्या है. कठोर चाइल्ड पॉलिसी के कारण चीन में वर्किंग पापुलेशन की संख्या कम हो गई है जिसके बाद मजबूरन उसे नागरिकों को 3 बच्चे पैदा करने की मंजूरी देनी पड़ी.चीन एक साथ अमेरिका ही नहीं बल्कि बाकी दुनिया के कई देशों से भी टेक्नोलॉजी वॉर में उलझ गया है. चीन ने सबसे उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स पर आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी के R&D में बहुत पैसा निवेश किया है. लेकिन परिणाम आने में समय लगेगा. इसमें चीन का बहुत ज्यादा संसाधन खर्च हो रहा है.

इसके अलावा भारत जैसे पड़ोसी राष्ट्र से सैन्य संघर्ष, दक्षिणी चीन सागर में बढ़ते तनाव और अमेरिका जैसी महाशक्ति से आर्थिक एवं सामरिक, दोनों मोर्चे पर चीन की बढ़ती लड़ाई उसके लिए चुनौती बन सकती है. एक साथ इतने मोर्चों पर संघर्ष ना केवल आर्थिक संसाधनों के लिए प्रतिकूल है बल्कि उसके ‘सॉफ्ट पावर’ पर भी प्रभाव डाल सकता है.

करोना के कारण भी चीन को वैश्विक स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है. अमेरिका सहित यूरोप के कई देशों ने चीन द्वारा लैब में कोरोनावायरस तैयार करने के आरोप की जांच शुरू कर दी है. इसके अलावा विश्व में सबसे तेज ग्रोथ रेट के बावजूद कोरोना के कारण खुद चीन को भी आर्थिक मोर्चे पर कठिनाई का सामना करना पड़ा है.

पिछले 100 साल में पार्टी मजूबत हुई है या कुछ ‘तानाशाह’ ?

माओत्से तुंग ने 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के गठन की घोषणा की और CPC के सबसे बड़े नेता बन गए. देंग शियाओपिंग जैसे बाद के नेताओं ने एक-व्यक्ति के शासन को समाप्त करने और निर्णयों में आम सहमति की अवधारणा लाने के लिए कदम उठाए,जैसे अधिकतम 2 कार्यकाल (5-5 साल का) की सीमा लागू करना.हू जिंताओ से सत्ता परिवर्तन के बाद शी जिनपिंग 2012 में सत्ता में आए और वो सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक बन गए – एक तरह से, माओत्से तुंग की तरह ही.लेकिन उन्होंने अपनी स्तिथि मजबूत करने के लिए 2018 में चीन के संविधान में कार्यकाल की सीमा को समाप्त करने के लिए संशोधन किया, जिससे जिनपिंग 2022 के बाद भी आधिकारिक तौर पर सत्ता में बने रहेंगे. इससे पार्टी नहीं बल्कि एक नेता की ‘तानाशाही’ मजबूत हुई है.

जहां पार्टी कम्युनिस्ट होने का दावा करती है वहीं उसकी भावना के विपरीत ‘उग्र राष्ट्रवाद’ को राजनीतिक तथा सामरिक टूल के रूप में प्रयोग भी करती है. वामपंथ की अवधारणा जहां कमजोरों (मजदूरों-श्रमिकों) को शोषण से बचाने के लिए तैयार की गई थी, वहीं चीन से मानवाधिकारों के उल्लंघन की खबरें आये दिन आती हैं.

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