India News: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने युवा दिवस पर एक भाषण दिया। इस भाषण ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। डोभाल ने युवाओं से इतिहास का प्रतिशोध लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रतिशोध शब्द अच्छा नहीं है लेकिन यह एक शक्ति है। इस बयान के बाद सवाल उठ रहे हैं कि वे किससे प्रतिशोध लेने की बात कर रहे हैं। विपक्ष के नेताओं ने इस बयान पर सवाल खड़े किए हैं।
अजित डोभाल ने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग-2026’ कार्यक्रम में भाषण दिया। उन्होंने युवाओं को नेतृत्व और अनुशासन के बारे में समझाया। डोभाल ने कहा कि भारत हमेशा इतना स्वतंत्र नहीं था। उन्होंने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष का जिक्र किया। डोभाल ने कहा कि हमारे गांव जलाए गए और मंदिर लूटे गए।
उन्होंने कहा कि हम मूकदर्शक बनकर देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है। डोभाल ने कहा कि हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है। उनका मानना था कि इससे महान भारत का निर्माण होगा। उन्होंने यहूदियों के सदियों पुराने संघर्ष का उदाहरण भी दिया।
राजनीतिक विपक्ष ने उठाए सवाल
इस बयान केबाद विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा। उन्होंने कहा कि यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका मानना है कि इससे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है।
कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने भी सवाल उठाए। उन्होंने पुलवामा हमले के बारे में पूछा। उन्होंने दिल्ली विस्फोट के पीछे के लोगों के बारे में जानना चाहा। विपक्ष का मानना है कि यह बयान सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देता है।
वहीं बीजेपी के कुछ नेताओं ने इस बयान का समर्थन किया। बीजेपी ओबीसी मोर्चा के नेता निखिल आनंद ने कहा कि डोभाल का बयान उचित है। उनका मानना है कि यह देश की सुरक्षा के हित में है। उन्होंने कहा कि लोगों को ऐतिहासिक तथ्य सुनने चाहिए।
विश्लेषकों के अलग-अलग मत
राजनीतिक विश्लेषक इस बयान कोलेकर दो खेमों में बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि डोभाल ने प्रतिशोध शब्द का गलत इस्तेमाल किया। वे पूछते हैं कि आज भारत किससे प्रतिशोध लेगा। क्या ब्रिटेन या अफगानिस्तान से प्रतिशोध लिया जाएगा।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि डोभाल का आशय अलग था। वरिष्ठ विश्लेषक सुशांत सरीन का मानना है कि डोभाल का मतलब प्रतिशोध नहीं था। उनका कहना था कि भारत को इतिहास से सबक लेना चाहिए। ताकि भविष्य में पुरानी गलतियां न दोहराई जाएं।
उनका मानना है कि डोभाल भारत की प्राचीन शक्ति को फिर से हासिल करने की बात कर रहे थे। वे चाहते थे कि युवा देश को मजबूत बनाने में योगदान दें। उनका संदेश आत्मनिर्भर और शक्तिशाली भारत का निर्माण करना था।
इतिहासकारों की अलग-अलग राय
इतिहास केविशेषज्ञ भी इस बयान पर अपनी राय रख रहे हैं। प्रोफेसर आदित्य मुखर्जी का मानना है कि इतिहास का चुनिंदा इस्तेमाल हो रहा है। उनका कहना है कि कुछ घटनाओं को ही हाईलाइट किया जाता है। जबकि बाकी सबको अनदेखा कर दिया जाता है।
उन्होंने बौद्ध मंदिरों के विध्वंस का उदाहरण दिया। उनका मानना है कि अगर हर समूह बदला लेने लगे तो समाज टिक नहीं पाएगा। उन्होंने इतिहास को लेकर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी।
वहीं प्रोफेसर मीनाक्षी जैन का इस पर अलग नजरिया है। उनका मानना है कि भारत के इतिहास को लंबे समय तक छुपाया गया। आज का युवा खुद इस इतिहास को खोज रहा है। इतिहास अब वर्तमान को प्रभावित कर रहा है।
भाषण का संदर्भ और अन्य बिंदु
डोभाल केभाषण में प्रतिशोध शब्द का इस्तेमाल सीमित था। उनका अधिकांश भाषण नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण पर केंद्रित था। उन्होंने युवाओं में अनुशासन और इच्छाशक्ति की अहमियत बताई। उन्होंने कहा कि टालमटोल की आदत खतरनाक होती है।
उन्होंने युद्धों के बारे में भी अपना विचार रखा। डोभाल ने कहा कि युद्ध मनोबल तोड़ने के लिए लड़े जाते हैं। अगर मनोबल नहीं है तो हथियार भी बेकार हैं। उन्होंने मौजूदा नेतृत्व को देश के लिए भाग्यशाली बताया।
सरकार की तरफ से अब तक इस बयान पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। बयान पर चल रही बहस जारी है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिए से इसकी व्याख्या कर रहे हैं। देश की युवा पीढ़ी इस बहस को गंभीरता से देख रही है।
