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वेनेजुएला के बाद अमेरिका का अगला निशाना कौन? ईरान, क्यूबा या कोई और?

Venezuela News: वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तूफान खड़ा कर दिया है। कई विश्लेषक इस कार्रवाई को अवैध तख्तापलट की संज्ञा दे रहे हैं। यह कदम सैन्य बल के इस्तेमाल से लिया गया और इसे अमेरिकी विदेश नीति में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इस घटना ने दुनिया भर में यह सवाल पैदा कर दिया है कि अमेरिका के टार्गेट पर अगला कौन सा देश हो सकता है। क्या यह कदम केवल वेनेजुएला तक सीमित रहेगा या फिर यह एक व्यापक रणनीति की शुरुआत है।

ईरान इस मामले में सबसे संभावित निशाने के रूप में उभर रहा है। ट्रंप प्रशासन ईरान के खिलाफ पहले से ही कड़ी रुख अपनाए हुए है। पिछले कुछ समय से ईरान में हो रहे प्रदर्शनों को अमेरिकी समर्थन मिलने की खबरें हैं। अमेरिका ने ईरान पर कड़ी नजर रखने की बात भी कही है। विशेषज्ञों को आशंका है कि मध्य पूर्व में अमेरिका किसी भी तरह के सैन्य हस्तक्षेप से पीछे नहीं हटेगा। अमेरिका अपने ऊर्जा हितों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठा सकता है।

क्यूबा और कोलंबिया भी चिंता में

क्यूबाभी अमेरिका की विदेश नीति में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। क्यूबा ने वेनेजुएला की सरकार को लगातार समर्थन दिया है। इसके चलते अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव बढ़ गया है। क्यूबा का मानना है कि अमेरिका की यह कार्रवाई केवल तख्तापलट नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही प्रभाव की इच्छा का परिणाम है। अमेरिका क्यूबा की सरकार को बदलने की कोशिश कर सकता है।

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इसी तरह कोलंबिया ने भी अमेरिका की इस कार्रवाई पर गहरी चिंता जताई है। कोलंबिया के राष्ट्रपति ने कहा है कि यह हमला क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है। इससे पड़ोसी देशों की संप्रभुता को चुनौती मिल सकती है। उनका मानना है कि अमेरिका के पास सैन्य हस्तक्षेप के अलावा भी विकल्प थे। कोलंबिया के विरोध के बाद ट्रंप ने वहां के राष्ट्रपति को सीधे चुनौती दी। इससे लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका है।

यूरोपीय सहयोगी भी निशाने पर

डेनमार्क और ग्रीनलैंड भीअमेरिकी विदेश नीति के संभावित लक्ष्य बन सकते हैं। डेनिश खुफिया एजेंसी ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में अमेरिका को एक संभावित खतरे के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका अपनी आर्थिक और तकनीकी शक्ति का दुरुपयोग कर रहा है। वह अपने पुराने मित्रों और सहयोगियों के खिलाफ भी दबाव बना रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयानों ने तनाव पैदा किया है।

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डेनमार्क नाटो का एक संस्थापक सदस्य है। फिर भी उसकी खुफिया रिपोर्ट चौंकाने वाली है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका आर्थिक ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इसमें ऊंचे टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंध शामिल हैं। रिपोर्ट यह भी इशारा करती है कि अमेरिका अपने सहयोगियों के खिलाफ भी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। नाटो की सुरक्षा गारंटी भी अब पूरी तरह विश्वसनीय नहीं रह गई है।

वैश्विक शक्ति विस्तार की रणनीति

डोनाल्ड ट्रंप केदूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। अमेरिकी नीति केवल सैन्य विकल्पों तक सीमित नहीं रही। अब वह राजनीतिक और आर्थिक दबाव की रणनीति भी अपना रहा है। कोलंबिया के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध इसका उदाहरण हैं। मैक्सिको पर टैक्स दरों का दबाव भी बढ़ाया जा रहा है। कई देशों के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ रहा है।

यह सब संकेत देता है कि अमेरिका अपनी शक्ति को फिर से स्थापित करना चाहता है। वह इंडो-पैसिफिक, यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इससे पारंपरिक सुरक्षा गठबंधनों पर गहरा असर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों को चुनौती मिलेगी। अमेरिका का यह रुख न केवल पड़ोसियों बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है।

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