Washington News: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला मामले के बाद अब अपनी नजरें ग्रीनलैंड पर टिका दी हैं। ट्रंप ने डेनमार्क के इस स्वायत्त द्वीप पर अमेरिका का अधिकार होने की वकालत की है। उनका दावा है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड का नियंत्रण जरूरी है। इस बयान के बाद वैश्विक राजनीति में भूचाल आ गया है। हालांकि, डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। यह द्वीप अपनी सामरिक स्थिति के कारण दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
बर्फ पिघलने से खुले नए समुद्री रास्ते
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह उत्तरी अटलांटिक महासागर में कनाडा और यूरोप के बीच स्थित है। उत्तरी ध्रुव के पास होने के कारण इसका 80 फीसदी हिस्सा बर्फ से ढका रहता है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में यातायात के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। ये नए जलमार्ग रूस, चीन और जापान से अमेरिका और यूरोप की दूरी को काफी कम कर देते हैं। यही कारण है कि दुनिया की महाशक्तियों की नजर अब इस बर्फीले क्षेत्र पर है।
रूस और चीन से मुकाबले की तैयारी
नए जलमार्गों पर कब्जा जमाने के लिए रूस और चीन लगातार प्रयास कर रहे हैं। ये देश अपने विशेष युद्धपोतों और पनडुब्बियों को यहां तैनात कर रहे हैं। ट्रंप का मानना है कि रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों से अमेरिका को खतरा है। ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व दूसरे विश्व युद्ध में भी देखा गया था। तब इस क्षेत्र ने हिटलर की सेना को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। अब अमेरिका इसे अपने नियंत्रण में लेकर विरोधियों को मात देना चाहता है।
अरबों का खजाना है ग्रीनलैंड के पास
ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का पहाड़ नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है। यहां तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों की भरमार है। ये खनिज इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, रक्षा तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा की बैटरियों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। अमेरिका भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इन संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। अमेरिका ने 1951 में डेनमार्क के साथ एक समझौता किया था। इसके तहत उसे यहां सैन्य अड्डे बनाने की अनुमति मिली थी। अब ट्रंप इसे पूरी तरह से हासिल करना चाहते हैं।
नाटो के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती
डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने अमेरिका के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि अगर चुनाव करना पड़ा तो वे डेनमार्क के साथ ही रहेंगे। जानकारों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश की संप्रभुता छीनने की इजाजत नहीं देता। लेकिन ट्रंप ने संकेतों में कहा है कि उन्हें कानूनों की परवाह नहीं है। ट्रंप टैरिफ बढ़ाने की धमकी देकर दबाव बना रहे हैं। इस विवाद से नाटो और यूरोपीय संघ के सामने संकट खड़ा हो गया है। अगर अमेरिका कोई बड़ा कदम उठाता है, तो विश्व व्यवस्था बिगड़ सकती है।

