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आदित्य विक्रम बिड़ला: भारत के पहले ‘ग्लोबल इंडस्ट्रियलिस्ट’ जिन्होंने लाइसेंस राज के दौर में तोड़ी सीमाएं

Business News: भारतीय औद्योगिक इतिहास में आदित्य विक्रम बिड़ला का नाम एक विशिष्ट स्थान रखता है। उन्हें भारत के पहले वैश्विक उद्योगपति के रूप में जाना जाता है। उन्होंने लाइसेंस राज के दौर में देश की सीमाओं से बाहर व्यापार का रास्ता खोला।

आदित्य विक्रम बिड़ला ने साबित किया कि भारतीय कंपनियां भी वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर सकती हैं। उनका जन्म चौदह नवंबर उन्नीस सौ तैंतालीस को कोलकाता में हुआ था। वह प्रसिद्ध उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला के पौत्र थे।

शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

आदित्य विक्रम बिड़ला ने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के एमआईटी से रासायनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। वह एक समृद्ध व्यावसायिक परिवार में पैदा हुए थे।

लेकिन उन्होंने विरासत पर निर्भर रहने के बजाय अपना मार्ग स्वयं चुना। उन्होंने परिवार की सुरक्षा से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने का निर्णय लिया। यह फैसला उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

लाइसेंस राज के विरुद्ध संघर्ष

उन्नीस सौ साठ के दशक में भारत लाइसेंस राज के दौर से गुजर रहा था। उद्योगों को हर विस्तार के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती थी। इस सीमित माहौल में आदित्य विक्रम बिड़ला ने एक नई राह खोजी।

उन्होंने तय किया कि यदि भारत में अवसर सीमित हैं तो व्यापार देश के बाहर फैलाया जाए। इस सोच ने भारतीय उद्योग जगत के लिए नए द्वार खोल दिए। उन्होंने वैश्विक विस्तार का जो मॉडल प्रस्तुत किया वह आज भी प्रासंगिक है।

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वैश्विक व्यापार का प्रारंभ

उन्नीस सौ उनहत्तर से उन्नीस सौ सतहत्तर के बीच उन्होंने कई देशों में उद्योग स्थापित किए। थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस और मलेशिया उनके प्रमुख केंद्र बने। इंडो थाई सिंथेटिक्स और पैन सेंचुरी एडिबल ऑयल्स जैसे उपक्रम शुरू किए।

उन्नीस सौ पचानबे तक उनके विदेशी व्यापार से आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व आने लगा। यह उपलब्धि उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय क्षमता का परिचय दिया।

पारिवारिक विरासत से अलग राह

परिवार चाहता था कि वे भारत में एल्यूमिनियम व्यवसाय संभालें। लेकिन आदित्य विक्रम बिड़ला ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि बिड़ला नाम की सुरक्षा से बाहर निकलना जरूरी है।

इस फैसले ने उन्हें एक स्वतंत्र उद्योगपति के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अपनी क्षमताओं और दूरदर्शिता से सफलता प्राप्त की। उनकी यह पहचान आज भी याद की जाती है।

असामयिक निधन और विरासत

उन्नीस सौ पचानबे में मात्र इक्यावन वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। कैंसर ने इस प्रतिभाशाली उद्योगपति को बहुत जल्दी छीन लिया। भारत ने एक ऐसे नेता को खो दिया जो नई दिशा दे रहा था।

उनके निधन के बाद उनके पुत्र कुमार मंगलम बिड़ला ने समूह की कमान संभाली। उस समय उनकी आयु केवल अट्ठाईस वर्ष थी। युवा होने के बावजूद उन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभाई।

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कुमार मंगलम बिड़ला का नेतृत्व

कुमार मंगलम बिड़ला ने पिता की विरासत को न केवल संभाला बल्कि विस्तार दिया। उनके नेतृत्व में समूह ने साठ से अधिक अधिग्रहण किए। समूह का कारोबार तेतीस गुना बढ़कर सड़सठ अरब डॉलर तक पहुंच गया।

हिंदाल्को द्वारा नोवेलिस का अधिग्रहण एक बड़ी उपलब्धि रही। यह सौदा वैश्विक सोच का प्रतीक बन गया। आज वह अल्ट्राटेक सीमेंट सहित कई कंपनियों का नेतृत्व करते हैं।

आदित्य बिड़ला समूह की वर्तमान स्थिति

आदित्य बिड़ला समूह आज देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों में शामिल है। समूह धातु, सीमेंट, रसायन और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में सक्रिय है। इसकी उपस्थिति दुनिया के कई देशों में है।

कुमार मंगलम बिड़ला की संपत्ति लगभग दो लाख करोड़ रुपये आंकी जाती है। वह देश के सबसे सफल उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। पिता की दूरदर्शिता को उन्होंने नए आयाम दिए हैं।

ऐतिहासिक महत्व और प्रेरणा

आदित्य विक्रम बिड़ला की कहानी भारतीय उद्यमिता की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक सफलता संभव है। उनका जीवन नवाचार और साहस का उदाहरण है।

युवा उद्यमी उनके जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। सीमाओं को चुनौती देने और नए बाजार खोजने की उनकी सोच आज भी प्रासंगिक है। भारतीय उद्योग जगत को दिशा देने में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

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