Middle East News: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले 15 दिनों से भीषण महायुद्ध जारी है। इस विनाशकारी जंग में ईरान की नौसेना और वायुसेना लगभग तबाह हो चुकी है। उसकी थलसेना भी भारी नुकसान झेल रही है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन ताकत भी अब खत्म होने की कगार पर है। इसके बावजूद ईरान पीछे हटने को बिल्कुल तैयार नहीं है। वह इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार मिसाइलें दाग रहा है। इस पूरी लड़ाई के पीछे हर देश का अपना एक स्वार्थ छिपा है। अमेरिका की सीधी नजर खाड़ी के तेल पर है। इजरायल अपने सबसे बड़े दुश्मन ईरान का पूर्ण खात्मा चाहता है। वहीं, ईरान किसी भी कीमत पर परमाणु बम हासिल करने की जिद पर अड़ा है। यह मिडिल ईस्ट का एक ऐसा खूनी खेल बन चुका है, जिसमें हर कोई अपना वजूद तलाश रहा है।
सत्ता और खौफ का ‘मिर्जापुर’ सिंड्रोम
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जब ताकत बढ़ानी हो, तो मोहरों का इस्तेमाल होता है। ईरान ने दशकों तक बिल्कुल यही किया। उसने खाड़ी में हूती, हिजबुल्लाह और हमास जैसे हथियारबंद गुटों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी। ये संगठन खाड़ी में प्रॉक्सी वॉर लड़ते रहे। निशाना हमेशा इजरायल और अमेरिका के सैन्य बेस होते थे। हमले ये गुट करते थे, लेकिन ट्रिगर ईरान के हाथ में होता था। ईरान हमेशा अपने हाथ साफ रखने का दिखावा करता रहा। यह सत्ता और खौफ कायम करने का एक पुराना और बेहद खतरनाक तरीका था।
डर के साये में 7 अक्टूबर का वो हमला
डर की एक ही खासियत होती है, वह कभी भी अचानक खत्म हो सकता है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने ठीक ऐसा ही किया। गाजा से इजरायल पर ‘ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड’ के तहत पांच हजार से ज्यादा रॉकेट दागे गए। आतंकियों ने सीमा पार करके इजरायल में बड़ी घुसपैठ की। इस खौफनाक हमले में लगभग 1,200 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया गया। इजरायल का वह डर जो कभी खत्म हो गया था, अचानक एक बड़े सदमे में बदल गया। यहीं से मिडिल ईस्ट की कहानी में एक खूनी मोड़ आ गया।
‘मारेंगे तभी जी पाएंगे’ की नीति पर इजरायल
इस खौफनाक हमले के बाद इजरायल ने तय कर लिया कि अब भयानक जवाब देना ही होगा। इसके नतीजे पूरी दुनिया के सामने हैं। गाजा पूरी तरह से मलबे के एक विशाल ढेर में बदल चुका है। हिजबुल्लाह की कमर टूट गई है और हूती विद्रोहियों को भी चुन-चुनकर मारा गया है। अब साल 2026 में युद्ध की यह आग ईरान के अंदर तक पहुंच चुकी है। इजरायल का सीधा और स्पष्ट संदेश है कि अपना वजूद बचाना है तो दुश्मन को जड़ से मिटाना होगा।
खौफ और ताकत का असली अमेरिकी खेल
दुनिया की राजनीति में सम्मान से ज्यादा खौफ काम आता है। अमेरिका और इजरायल हमेशा इसी नीति पर चलते हैं। दुनिया भर में कई देश इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते। लेकिन इनके सैन्य रुतबे से खौफ जरूर खाते हैं। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक सैन्य ताकत है। उसका हथियारों का नेटवर्क और हर कोने में मौजूद मिलिट्री बेस उसे अजेय बनाते हैं। इसी भारी ताकत के खौफ से कई देश सीधे टकराव से कतराते हैं और ईरान के मुद्दे पर पूरी तरह खामोश हैं।
रूस और पुतिन का खामोश मास्टरस्ट्रोक
जब मिडिल ईस्ट में लगातार गोलियां चल रही हैं, तब एक और बड़ा खिलाड़ी खामोशी से अपना खेल खेल रहा है। वह अहम खिलाड़ी रूस है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त ईरान और इजरायल के युद्ध पर टिकी हैं। लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नजर सिर्फ तेल के बाजार पर है। पश्चिमी देशों ने रूस पर कई बेहद सख्त पाबंदियां लगाई हैं। लेकिन दुनिया की ऊर्जा की भूख इतनी बड़ी है कि रूस से पूरी तरह किनारा करना किसी के लिए संभव नहीं है। इसी बीच कई देशों को रूसी तेल खरीदने की छूट मिल गई है। युद्ध का शोर मिडिल ईस्ट में है, लेकिन इसका सीधा आर्थिक फायदा रूस उठा रहा है।
तबाही के इस खेल में किसी को कुछ नहीं मिलेगा
इस भयानक महायुद्ध का सबसे कड़वा सच यही है कि हर देश अपना एजेंडा लेकर मैदान में उतरा है। अमेरिका को खाड़ी का तेल और अहम समुद्री रास्तों पर पूरा नियंत्रण चाहिए। इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए ईरान को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता है। दूसरी तरफ, ईरान हर हाल में एक परमाणु ताकत बनना चाहता है। मिडिल ईस्ट का इतिहास गवाह है कि यहां युद्ध शुरू करना बहुत आसान है। लेकिन उसे खत्म करना लगभग नामुमकिन होता है। यह जंग जितनी लंबी खिंचेगी, तेल उतना ही महंगा होगा। दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा जाएंगी और नए दुश्मन पैदा होंगे। अंत में शायद वही होगा जो मिर्जापुर में कहा गया था। हर किसी को अपना पूर्वांचल चाहिए, लेकिन असल में किसी को कुछ नहीं मिलेगा।

