Himachal News: हिमाचल प्रदेश के अभिभावकों के लिए एक बड़ी खबर है। नर्सरी से लेकर पहली कक्षा में बच्चों के दाखिले को लेकर चल रहा लंबा विवाद अब सुलझ गया है। राज्य सरकार ने आयु सीमा के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए स्थिति स्पष्ट कर दी है। अब यदि कोई बच्चा 30 सितंबर तक संबंधित कक्षा के लिए तय न्यूनतम आयु पूरी कर लेता है, तो स्कूल उसे प्रवेश देने से मना नहीं कर पाएंगे। शिक्षा सचिव ने इस संबंध में लिखित निर्देश जारी कर दिए हैं। इस फैसले से उन हजारों बच्चों का साल बर्बाद होने से बचेगा, जो महज कुछ दिनों के अंतर से दाखिले से वंचित रह जाते थे।
30 सितंबर की समयसीमा ने आसान की राह
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नर्सरी और बालवाटिका की सभी श्रेणियों सहित पहली कक्षा के लिए 30 सितंबर की कट-ऑफ डेट लागू होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर बच्चा शैक्षणिक सत्र के दौरान सितंबर के अंत तक अपनी उम्र के मानदंड पूरे करता है, तो वह स्कूल जाने का हकदार है। विभाग के पास लगातार फील्ड अधिकारियों और माता-पिता की शिकायतें पहुँच रही थीं। इसे देखते हुए सरकार ने नियमों की समीक्षा की। अब नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए स्कूलों को इन दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा।
उदाहरण से समझें दाखिले का पूरा गणित
शिक्षा विभाग ने इस नियम को उदाहरणों के जरिए विस्तार से समझाया है। यदि किसी बच्चे का जन्म 15 अप्रैल 2023 को हुआ है, तो वह सत्र 2026-27 में बालवाटिका-1 में प्रवेश ले सकता है। वह 15 अप्रैल 2026 को तीन साल का हो जाएगा, जो 30 सितंबर की समयसीमा के भीतर है। इसी तरह पहली कक्षा में दाखिले के लिए 30 सितंबर तक छह साल की उम्र पूरी होना अनिवार्य है। सरकार का कहना है कि इसमें अभिभावकों की सहमति भी जरूरी होगी। अगर माता-पिता तैयार हैं और आयु सीमा पूरी है, तो स्कूल प्रबंधन दाखिला देने के लिए बाध्य होगा।
निजी स्कूलों पर भी चलेगा हंटर, होगी कार्रवाई
यह नियम हिमाचल के केवल सरकारी स्कूलों तक ही सीमित नहीं है। राज्य के सभी निजी स्कूलों को भी इन निर्देशों का पालन करना होगा। शिक्षा विभाग ने चेतावनी दी है कि नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों के खिलाफ आरटीई (RTE) एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यदि कोई स्कूल पात्र बच्चे को दाखिला देने से इनकार करता है, तो अभिभावक सीधे जिले के उपनिदेशक (प्रारंभिक शिक्षा) से शिकायत कर सकते हैं। इस मामले में उपनिदेशक का फैसला अंतिम होगा और स्कूलों को उसे मानना ही पड़ेगा।


