बुरे फंसे चीन से कोरोना वैक्सीन लेने वाले 90 देश, अब बहानेबाजी करने लगा ड्रैगन

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मंगोलिया की सरकार ने अपने देश की जनता से वादा किया था कि गर्मी आते आते देश कोरोना के खिलाफ जंग में जीत हासिल कर लेगा। बहरीन ने कहा कि देश में कुछ महीनों के बाद स्थिति पूरी तरह से सामान्य होगी, क्योंकि वैक्सीनेशन काफी तेजी से जारी है। बेहद छोटे द्वीप सेशेल्स ने घोषणा कर दी कि देश में वैक्सीनेशन पूरी रफ्तार के साथ जारी है और बहुत जल्द देश की अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर लौटने लगेगी। ये तीनों देश, उन दर्जनभर देशों में शामिल हैं, जिन्होंने चीन के वैक्सीन पर विश्वास किया था, लेकिन अब इन देशों की स्थिति काफी विकराल हो चुकी है और कोरोना वायरस के सामने चीनी वैक्सीन पूरी तरह से फेल साबित हुई है।

चीनी वैक्सीन पूरी तरह से फेल

चीन का वैक्सीन बहुत आसानी से उपलब्ध है, लिहाजा इन तीनों देशों ने चीन से ही वैक्सीन खरीदा और बड़े पैमाने पर अपने देश में वैक्सीनेशन शुरू किया। लेकिन, वैक्सीनेशन के बाद कोरोना वायरस से जहां इन देशों को मुक्ति मिलनी चाहिए थी, वहां ये देश बुरी तरह से कोविड-19 की चपेट में फंस चुके हैं। इन देशों की आबादी बिहार या उत्तर प्रदेश जितनी भी नहीं है, लेकिन इन्हें काफी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। चीन ने पिछले साल अपने वैक्सीन कूटनीति अभियान को तेजी से चलाया था और वैश्विक समुदाय को विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि चायनीज वैक्सीन काफी कारगर है और कोविड-19 के गंभीर मामलों को भी रोकने में कारगर है। लेकिन, अब पता चल रहा है कि चीन की वैक्सीन डिप्लोमेसी पूरी तरह से झूठी थी।

वैक्सीन के बाद भी फैलता वायरस

रिपोर्ट के मुताबिक जिन देशों में चायनीज वैक्सीनेशन किया गया है, वहां फिर से काफी तेजी के साथ कोरोना वायरस फैल रहा है और वैक्सीन लगवा चुके लोगों की भी वायरस जान ले रहा है। चीनी वैक्सीन कोविड-19 के अलग अलग वेरिएंट के खिलाफ तो पूरी तरह से फेल साबित हुई हैं और वैक्सीन लगवा चुके लोगों को भी कोरोना संक्रमित होने के बाद रिकवरी करने में काफी वक्त लगता है। इन देशों में कोरोना वायरस रिकवरी रेट काफी कम है और वायरस के फैलने की रफ्तार ज्यादा।

50 प्रतिशत से ज्यादा वैक्सीनेशन

ताज्जुब की बात ये है कि सेशेल्स, चिली, बहरीन और मंगोलिया जैसे देशों में 50 प्रतिशत 68 प्रतिशत तक वैक्सीनेशन का काम पूरा हो चुका है। इन देशों ने वैक्सीनेशन को लेकर अमेरिका समेत कई विकसित देशों को काफी पीछे छोड़ रखा है। ये चारों देश वैक्सीनेशन की लिस्ट में टॉप-10 में आते हैं लेकिन इन देशों में अभी कोरोना वायरस बुरी तरह से फैला हुआ है। जबकि वैज्ञानिकों का मानना है कि 30 प्रतिशत वैक्सीनेशन होने के बाद कोई भी देश अपने आपको बहुत हद तक सुरक्षित मान सकता है और 50 प्रतिशत से ज्यादा वैक्सीनेशन होने के बाद वायरस के इस तरह से फैलने का खतरा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इन चारों देशों ने अपने देश में वैक्सीनेशन के लिए चीन की दो वैक्सीन सिनोफर्म और सिनोविक बायोटेक का इस्तेमाल किया है। हांगकांग यूनिवर्सिटी के वायरस एक्सपर्ट जिन डोंगयान ने फिर से संक्रमण बढ़ने को लेकर कहा कि ‘इस्तेमाल की गई वैक्सीन अगर असरदार होती तो निश्चित तौर पर वायरस का ग्राफ नहीं बढ़ना चाहिए था। चीन की जिम्मेदारी है कि वो इसे तुरंत ठीक करे।’ वैज्ञानिक भी नहीं समझ पा रहे हैं कि जब इन देशों इतनी तेज रफ्तार से वैक्सीनेशन कार्यक्रम चलाया गया, फिर भी ये देश कोरोना वायरस की चपेट में बुरी तरह से फंसे क्यों हैं।

वैक्सीनेशन के बाद सुधार

अमेरिका में 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी का टीकाकरण किया जा चुका है। अमेरिका में फाइजर-बायो एन टेक और मॉडर्ना वैक्सीन से टीकाकरण किया जा रहा है। जिसके बाद अमेरिका में पिछले 6 महीने में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले 94 प्रतिशत कम हो चुके हैं और अब अमेरिका में कम भीड़भाड़ वाले जगहों पर मास्क पहनने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी गई है। वहीं, अमेरिका के बाद इजरायल भी अपने आप को वायरस फ्री राष्ट्र घोषित कर चुका है। इजरायल में भी अमेरिकन वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया है, जबकि इजरायल के बाद वैक्सीनेशन के मामले में सेशेल्स है, जहां चीनी वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया, लेकिन संक्रमण का ग्राफ काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

90 देशों में चायनीज वैक्सीन

कोरोना वायरस ने एक तरह से दुनिया को तीन हिस्सों में बांटकर रख दिया है। एक वो देश हैं, जो काफी अमीर हैं और जिन्होंने वैक्सीनेशन के लिए अपनी इन्फ्रांस्ट्रक्चर का बेहतरीन इस्तेमाल किया है और अपने संसाधनों की बदौलत जिन्होंने कोराना वायरस संक्रमण को करीब करीब रोकने में कामयाबी हासिल कर ली है। दूसरे नंबर पर वो देश हैं, जिन्होंने चीनी वैक्सीन का इस्तेमाल किया है लेकिन ऐसे देशों में सुरक्षा का घेरा बेहद कमजोर है और असर भी दिख रहा है। वहीं, तीसरे नंबर पर वो देश हैं, जहां अभी तक वैक्सीन पहुंची ही नहीं है। बात अगर चायनीज वैक्सीन की करें तो विश्व के करीब 90 देशों को चीन वैक्सीन भेज रहा है और इन देशों ने जल्दी जल्दी वैक्सीनेशन करने के बाद पाबंदियों में छूट देनी शुरू कर दी, ताकि देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाया जा सके और लोग अपनी सामान्य जिंदगी फिर से शुरू कर सकें, लेकिन फिर से संक्रमण में आई तेजी ने इन देशों का सपना तोड़ दिया है। वहीं, वैक्सीन लेने के बाद भी लोगों के संक्रमित होने के चलते वैक्सीन को लेकर लोगों का विश्वास पूरी तरह से टूट गया है और सरकार के लिए वैक्सीन में लोगों का विश्वास फिर से बढ़ाना काफी मुश्किल साबित हो रहा है। मंगोलिया के ओटगोंजार्गल बातरी ने कहा कि ‘वैक्सीन का दोनों डोज लेने के एक महीने से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी मैं पॉजिटिव हो गया और मेरी स्थिति काफी खराब हो चुकी थी। ऐसे में अब हमारा विश्वास वैक्सीन से पूरी तरह टूट चुका है।’

फायदा उठाने की कोशिश में चीन

चीन अपनी वैक्सीन डिप्लोमेसी का फायदा उठाना चाहता है और वो काफी तेजी से वैक्सीन का निर्माण करते हुए जरूरतमंद देशों तक वैक्सीन पहुंचा रहा है। जब तक भारत वैक्सीन सप्लाई कर रहा था, तब तक सिर्फ 18 देशों ने ही चायनीज वैक्सीन को लेकर समझौता किया था, लेकिन जब भारत ने वैक्सीन की सप्लाई रोक दी, उसके बाद अब 90 से ज्यादा देश वैक्सीन को लेकर चीन से समझौता कर चुके हैं। भारत अभी विदेशों में बिल्कुल भी वैक्सीन नहीं भेज रहा है। वहीं, चीन काफी आक्रामक तरीके से इस महामारी का फायदा उठाने में लगा हुआ है। शी जिनपिंग ने ‘पब्लिक गुड हेल्थ’ कहते हुए विश्व के सभी जरूरतमंद देशों तक वैक्सीन जल्द उपलब्ध करवाने की बात की है, वहीं, जरूरतमंद देशों को पहले जो भी वैक्सीन मिल रही है, वो उसे ले रहे हैं। मंगोलिया की आबादी काफी कम है और उसने चीन से लाखों वैक्सीन की डोज लेकर अपनी 52 प्रतिशत से ज्यादा आबादी को वैक्सीन की दोनों खुराक दे दी है, लेकिन उसके बाद भी रविवार को मंगोलिया में 2400 नये मामले दर्ज किए गये हैं। वहीं, इन देशों में काफी तेजी से बढ़े संक्रमण के ग्राफ को लेकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि ‘वैक्सीन और संक्रमण बढ़ने के बीच कोई लिंक नहीं है और डब्ल्यूएचओ भी चीनी वैक्सीन पर मुहर लगा चुका है।’

चायनीज वैक्सीन संदिग्ध क्यों?

अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली दोनों वैक्सीन की कारगरता का दर 90 फीसदी से ज्यादा है, जबकि चीन की वैक्सीन सिर्फ 51 प्रतिशत कारगर है। उसमें भी चीन में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों ने वैक्सीन की कारगरता पर क्लिनिकल आंकड़े पेश नहीं किए हैं। चीनी वैक्सीन कंपनियों ने ये भी नहीं बताया है कि उनकी वैक्सीन किस तरह से संक्रमण को फैलने से रोक सकता है। चाइनीज सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के रिसर्चर शाओ यिमिंग ने कहा कि चीन को अपनी आबादी का 80% से 85% लोगों को पूरी तरह से वैक्सीनेट करना होगा और उसके बाद ही चीन हर्ड इम्यूनिटी को पूरा कर सकता है। जबकि पहले चीन ने 70 प्रतिशत की बात की थी। ऐसे में साफ जाहिर होता है कि चीन में वैक्सीन को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती गई है।

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