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86 वर्ष की आयु में बकरी पालन कर आजीविका चला रहे सूरम सिंह

ऐसे समय में जब वैश्विक कोरोना महामारी के कारण काम धंधे ठप्प पड़े हुए हैं। सवा साल से बंदिशों की मार है। ऐसे दौर के बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने गांव और घर पर रहकर बेहतर स्वरोजगार जुटाने में लगे हुए हैं। कोई सब्जी उत्पादन में लगा है तो कोई भेड़ बकरियां पालकर अपनी आजीविका चला रहा है। ऐसे ही व्यक्ति हैं गांव डंगोली के 86 वर्षीय वृद्ध सूरम सिंह जो बकरियों के पालन पोषण के जरिए शानदार ढंग से अपनी आजीविका चला रहे हैं। बड़ी बात यह है कि न तो इन्हें लॉकडाऊन का कोई असर है और न ही किसी प्रकार से इन्हें बाजार पर निर्भर रहना पड़ रहा है। लॉकडाऊन लगे या कोई और बंदिशें, घर से वन और वनों से घर का सफर रोजाना जारी है। 

86 वर्षीय की आयु में वृद्ध सूरम सिंह प्रतिदिन 8 से 9 किलोमीटर पैदल चलकर अपना रोजगार चलाकर अपने परिवार के पालन-पोषण में मद्द कर रहे हैं। वह बकरी पालन का स्वरोजगार अपनाकर समाज की नई पीढ़ी को आइना दिखा रहे हैं। गर्मी हो या सर्दी वह प्रतिदिन बकरियों को चराने क लिए लेकर जाते हैं। गांव डंगोली के सूरम सिंह ने करीब 25 बकरियां रखी हुई हैं। वह शुरू से ही यह कार्य कर रहे हैं। पहले उनके पास इससे अधिक बकरियां होती थी लेकिन जैसे-जैसे आयु बढ़ रही है तो इन्हें संभालना भी कठिन होता है। 86 वर्ष की आयु में भी पूर्ण रूप से स्वस्थ सूरम सिंह कहते हैं कि अब पहले बाली बात नहीं रही जिस कारण उन्होंने अब बकरियों की संख्या कम कर दी है। 

खास बात यह है कि बकरियों का दूध उसके घर पर ही बिक जाता है। वह 100 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से दूध बेच रहे हैं। बुजुर्ग सूरम सिंह कहते हैं कि वह 6ठी कक्षा तक पढ़े हैं। उस समय बरनोह में स्कूल होता था और वहीं पर उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। वह उर्दू जानते हैं लेकिन ज्यादा नहीं। उन्होंने कहा कि वह सुबह 11 बजे बकरियों को चरने के लिए लेकर जाते हैं और करीब 8 से 9 किलोमीटर तक आना जाना हो जाता है। वह बकरियों को डंगोली से लेकर मदनपुर तक ले जाते हैं। सूरम सिंह अपनी 85 वर्षीय पत्नी शीला के साथ गांव डगोली में रहते हैं। बुजुर्ग सूरम सिंह कोरोना के प्रति जागरूक हैं। उन्होंने कहा कि वह न तो किसी के घर जाते हैं और न ही आते हैं। वह प्रतिदिन इसी तरह बकरियों को चरने के लिए लेकर जाते हैं जिससे अन्य लोगों से दूरी बनी रहती हैं। उन्होंने बताया कि वह 2 समय खाना खाते हैं और पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं। वह किसी भी दवाई का सेवन नहीं करते हैं। वह बताते हैं कि बंदिशें बढऩे का उन पर कोई असर नहीं है। बकरियों का हर रोज दूध बिक जाता है जिससे वह परिवार के पालन-पोषण में मद्द कर रहे हैं। 

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