India News: गणतंत्र दिवस की परेड केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं है। यह भारत की विदेश नीति का आईना भी है। कर्तव्य पथ पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित विदेशी नेता, देश की कूटनीतिक प्राथमिकताएं बताते हैं। 1950 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो से शुरू हुई यह परंपरा अब 2026 में यूरोपीय संघ तक पहुंच गई है।
1955: राजपथ की पहली परेड और पाकिस्तानी मेहमान
गणतंत्र दिवस इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय 1955 से जुड़ा है। इस साल पहली बार परेड स्थाई तौर पर राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर हुई। इस ऐतिहासिक मौके पर भारत ने एक चौंकाने वाला न्योता दिया। देश ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को मुख्य अतिथि बनाया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र मोहम्मद का भारत से नाता था। उस समय यह आमंत्रण दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की बड़ी कोशिश मानी गई।
2026: नई परंपरा, यूरोपीय संघ का शीर्ष नेतृत्व आएगा
साल 2026 में भारत ने एक नई इबारत लिखी है। इस बार किसी एक देश के बजाय एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के नेताओं को आमंत्रित किया गया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा मुख्य अतिथि होंगे। यह कदम भारत और यूरोपीय संघ के बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक सहयोग का संकेत है। परेड के अगले दिन 27 जनवरी को भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन भी होगा।
मुख्य अतिथि चयन की प्रक्रिया
गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि चुनना एक सोची-समझी रणनीति है। विदेश मंत्रालय इसकी तैयारी करीब छह महीने पहले शुरू कर देता है। चयन में तीन मुख्य बातें देखी जाती हैं। पहला है रणनीतिक और आर्थिक संबंधों का महत्व। दूसरा है सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव। तीसरा पहलू है भू-राजनीतिक संदेश। उदाहरण के लिए, 2026 में यूरोपीय संघ के नेताओं को बुलाने से मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत को गति मिलने की उम्मीद है।
ऐतिहासिक मुख्य अतिथि और उनका महत्व
इतिहास में कई मुख्य अतिथि विशेष रहे हैं। 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आए थे। वह इस मौके पर आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने। फ्रांस सबसे ज्यादा छह बार मुख्य अतिथि बनने वाला देश है। 2024 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यह सम्मान पाया था। हर मेहमान भारत की वैश्विक साझेदारी की एक नई कहानी कहता है।

