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किसान का काला दिवस वनाम सरकार की प्राथमिकता छवि: अमर सिंह राघवा


पूरा देश देख रहा है कि देश भर का जागृत किसान आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए पिछले एक साल से संघर्ष कर रहा है और पिछले छह माह से दिल्ली की सीमाओं पर कई उतार चढ़ावों के बावजूद शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहा है। 26 मई को छह माह पूर्ण होने पर किसान अपने घर, गांव, शहर और चौराहों पर पूरे देश में काला दिवस मनायेगा।

इस मौके पर एक बार तीन काले कृषि कानूनों को आसान शब्दों में दोहराने की ज़रूरत है।

1.कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा ) विधेयक 2020. यह विधेयक पहले कृषि मंडिया खत्म करेगा उसके बाद किसानो की लूट करेगा।

2.मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण संरक्षण ) अनुवंध विधेयक 2020. यह विधेयक धीरे धीरे दीमक की तरह किसानों को अपनी मलकीयत ज़मीन से वंचित कर देगा और ज़मीन बड़े घरानों और कंपनियों के कब्जे में हो जायेगी।

3.आवश्यक वस्तु संशोधन बिल -1955. यह विधेयक आवश्यक वस्तुओं को स्टोर करने और कालाबाजारी की खुली छूट देता है।

निष्कर्ष यही है कि किसान से सस्ते में फ़सल खरीदी जायेगी और उपभोक्ताओं में मंहगी बेची जायेगी। इसके अलावा किसानों की मुख्य मांग है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की है जिसे ये कंपनियां जो कृषि क्षेत्र में कब्ज़ा करने की तैयारी में जुटी है, कभी नहीं बनने देगी । अब पूरा देश जानता है कि सरकार ने इन कानूनों को लाने और देश की बहुमूल्य सम्पदा व कंपनियों को बेचने का निर्णय तब लिया जब जनता कोरोना संकट का सामना कर रही थी और अब भी कर रही है। और सब जानते है कि इस संकट में देश को डालने के लिए सरकार भी काफ़ी हद तक जिम्मेदार है। जब इस महामारी को रोकने के लिए कदम उठाने थे तब भीड़ इकट्ठी की गई फिर आनन फानन फ़ैसले लेकर देश को गर्त मे धकेल दिया है।

देश का दर्द अस्पतालों के बाहर, अस्पतालों में, नदियों में, गंगा किनारे रेत के नीचे और शमशान घाटों की लाइनों में पूरी दुनिया ने देखा और देखा जा रहा है। इस सबके बावजूद सरकार की प्राथमिकता बीमारी से निपटने और किसानो की मांगों के बजाय सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने, विधायकों को झंडी, सोशल साइट्स पर प्रतिबंध, टूलकिट, नया संसद भवन और छबि सुधारने व आगामी चुनाव जीतने की है। जबकि सरकार को यह मालूम है कि आज अगर देश इस महामारी के संकट को कुछ हद तक सहन कर पा रहा है उसके पीछे देश की किसानी का ही योगदान है। देश की लगभग 70% आबादी किसी न किसी रूप से कृषि पर निर्भर है और इसके अलावा भी लगभग 10% आबादी कृषि उपकरणों व व्यापार इत्यादि से जुड़ी है। इसी कारण देश आज इस संकट को झेल पा रहा है। जहां देश में व्यापार और उद्योग घाटा दिखा रहा है और बड़ी कंपनियों के कर्जे भी सरकार द्वारा माफ़ किये गए और बट्टे खाते में डाले गए व कई तरीकों से सहायता भी दी गई। परन्तु लगातार बढ़ती महंगाई व इस महामारी के बावजूद किसानों को सरकार ने कुछ नहीं दिया फिर भी किसानी के कारण देश संकट का सामना कर पा रहा है।

यही वो संपति है जिस पर देशी और विदेशी कंपनियों की नज़र है और इस सरकार के माध्यम से कृषि क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के लिए ये तीनों कृषि बिलों को किसानो पर थोपा गया है। इसलिए अब सरकार सारे ढोंग करके किसी न किसी तरह छबि सुधारने और आगामी चुनावों को ही प्राथमिकता पर रख रही है। इस मौके पर सरकार को याद दिलाना ज़रूरी है कि 1906-07 में अंग्रेजों द्वारा इस तरह के तीन किसान विरोधी बिल लाए गए थे। जिनके विरोध में शहीद भगत सिंह के पिता और चाचा द्वारा आंदोलन चलाया गया था और नौ महीने के लंबे आंदोलन के बाद अंग्रेजों को कानून वापस लेने पड़े थे। और जो हालात बीजेपी के मंत्रियों के जगह जगह हो रहे है। इसी तरह उस समय अंग्रेज़ों के साथ हो रहा था तो मजबूरन अंग्रेज़ों ने कानून वापस लिए थे। यह भी सरकार को समझना चाहिए कि इस धरती पर सबसे पहले इंसानी जीवन को किसानी से ही स्थाई जीवन और विकास मिला है। किसानी ही समाज का मूल आधार है इसे समाप्त करने का मतलब जीवन और समाज को समाप्त करना होगा। इसलिए सरकार को अगर अपनी छवि की इतनी चिंता है तो तीनों कृषि बिलों को वापस लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की पहल करें। किसानो का यह आंदोलन देश के आम आवाम और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए है इसलिए हर जागृत नागरिक का फ़र्ज़ बनता है कि खुद भी इसका समर्थन करें और दूसरो को भी समर्थन के लिए जागृत करके सरकार पर तीनों कृषि बिलों को वापस लेकर समर्थन मूल्य पर कानून बनाने पर विवश करें। 26 मई को काला दिवस की सफलता की कामना व आंदोलन की कामयाबी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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