सीपीआईएम नेता कुशाल भारद्वाज का कोरोना के साथ अनुभव; सोर्स फेसबुक पोस्ट

अनुभव सांझा कर रहा हूं..
कोरोना को मजाक न समझें, कोरोना को हल्के में न लें। कोरोना साधारण खांसी-जुकाम नहीं है, यह निश्चित ही एक बड़ी आफत है और जानलेवा है। दुनियां भर के वैज्ञानिकों ने जो अब तक इसे समझा है और बचाव के जो उपाय सुझाए हैं, उन तौर तरीकों का पालन करके ही हम अपने-आपको व एक-दूसरे को बचा सकते हैं।

वैसे तो जिंदगी शुरू से ही कठिन व संघर्षमय रही है। लेकिन हर विपरित परिस्थिति का डट कर मुकाबला किया है और हमेशा ही जिंदगी को जिंदादिली से जीया है। घर में जैसी मर्जी कठिनाइयाँ रही हों लेकिन फिर भी जनसेवा के लिए व सामाजिक, राजनीतिक कार्यों के लिए जितना संभव हो सका समय देता रहा हूं। पिछले एक महीने से भी ज्यादा समय से घर में बीमारी व कुछ अन्य कारणों से कई कठिनाइयों से घिरा रहा हूं। सोशल मीडिया भी एक-दो बार ही 2-3 मिनट के लिए इस्तेमाल कर पाया हूं।

इसी दौरान कोविड-19 पॉजि़टिव आने के बाद मैंने सचमुच मौत को नजदीक से देखा है। लगभग 10 दिन तक बुखार रहा। 4 रातें तो बिना सोये ऐसी गुजरीं जैसे कि मौत बार-बार मुझ से मेरी सांसें छीनने के लिए आती रही हो, ऐसा लगता था जैसे किसी ने पूरी ताकत से मेरा गला घोंट दिया हो, मैं मुकाबला करता रहा, व्याकुल होकर खिड़की की तरफ दौड़ता था कि शायद सांस की डोर जो छूटती जा रही है, वह इसी रास्ते से वापस पटरी पर आ जाए। ऐसा एक रात में ही 15-16 बार होता था। तकलीफ तो दिन में भी रहती थी, लेकिन रात आते ही समस्या गम्भीर हो जाती थी। अंधेरा होते ही अहसास होने लगता था कि मौत आज फिर झपटा मारने आयेगी और मुझे उससे लड़ना ही होगा और फिर से पूरी रात बिल्कुल यही होता था। जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष चलता था। मैं एक ही शख्स को फोन कर पाता था। रात एक बजे हो या दो बजे हों, यह शख्स मेरा फोन जरूर उठाते थे। इन शख्स का नाम Dr. T. Shring है। ये आधी रात को भी इतनी आत्मीयता से बात करते थे जैसे मेरे लिए ही जगे होंं । वे बोलते थे ऑक्सीजन लेवल चैक करो। मुझसे फोन से भी ज्यादा बात नहीं हो पाती थी। मैं इनको सिर्फ इतना कहता था कि डॉक्टर साहब सांस नहीं आ रही और ऐसा लग रहा है जैसे मेरे प्राण निकलने वाले हैं तो डॉक्टर साहब यही कहते थे कि आपको कुछ नहीं होगा। वे हौंसला देते थे कि उन्हें अस्पताल में ही बहुत से लोगों ने बताया कि कुशाल जी आप हमेशा गरीबों के हक के लिए लड़ते हो। लोगों की सेवा करते हो और सब लोग कह रहे थे कि इनको कुछ नहीं होना चाहिए। मुझे नहीं पता कि डॉक्टर साहब ऐसी बातें करके मुझे इंजाइटि से बाहर लाने की कोशिश करते थे या फिर सच में ही लोगों से उनको ऐसी फीडबैक मिली थी। लेकिन आधी रात को भी बिना शिकन उनका मुझ से बात करना, गाईड करना व हौंसला देना मुझे मौत से लड़ने की प्रेरणा देता था।

मैं आप लोगों को डराने के लिए ये सब नहीं लिख रहा हूं, जो मेरे साथ घटित हुआ वही बयान कर रहा हूं। शायद मेरे लिए कोरोना इस लिए ज्यादा घातक बन गया था कि कुछ वर्ष पूर्व मेरे गले के वोकल कॉर्ड का ऑपरेशन हुआ है, जिसमें मुझे अभी भी कई परहेज करने पड़ते हैं। पिछले कुछ दिन से लगातार सूखी खांसी, गले में एक प्वांइट पर बने दबाव व लगातार दवाइयां खाने के बावजूद एक हफ्ते से ज्यादा तक तेज बुखार ने मेरे लिए कोरोना का कहर भयावह रहा है। जैसे ही मुझे स्वंय में हल्के सिंप्टम का अहसास हुआ तो मैंने स्वयं को कमरे में सेल्फ आइसोलेट कर लिया था। मैं जब भी बाथरूम जाता था तो लौटती बार नलकों व बथरूम में भी व वाशबेसिन में भी गर्म खौलता हुआ पानी डाल लेता था। तथा पॉजिटिव आने से पहले ही बेटे व पत्नी को भी उस बाथ रूम का इस्तेमाल न करने को कह दिया था।

मेरी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि रात को जो कुछ भी मेरे साथ घटित होता था, उसको मैं अपने परिवार के सदस्यों को बता भी नहीं सकता था। बुजुर्ग माता-पिता पिछले कुछ वर्षों से बैड-रिडन हैं, लगातार डॉक्टरी ईलाज, दवाई व मेरी पत्नी के सेवा भाव व आत्मीयता से उनकी सांसों की डोर चल रही है। मैं अपनी बेहद नाजुक स्थिति बारे पत्नी को भी नहीं बता सकता था, क्योंकि वे स्वयं भी स्वास्थ्य संबंधी बहुत सी समस्याओं से जूझ रही हैं तथा उनको एक दम से इंजाइटी हो जाती है। वे स्वंय भी कोविड-19 पॉजिटिव आई हैं तथा उनका भी घर में ही ट्रीटमेंट चल रहा है। गनीमत रही कि उनको कोई गंभीर समस्या उत्पन्न नहीं हुई।

एक बेटा है जिसने इस कठिन दौर में पूरे परिवार को संभाला है। उस ने दादू-दादी के कमरे में जमीन पर अपना बिस्तर लगाया है। सबके लिए पानी गर्म करना, चाय बनाना, 3 टाईम का खाना पकाना, व बाकि के सब काम भी अभय ही कर रहा है। साथ अपनी पढ़ाई भी करता है। कभी-कभी सोचता हूं बेटा हिम्मत व लगन वाला न होता तो मेरे बुजुर्ग व लाचार मां बाप व हम दोनों को आज रोटी भी कौन खिलाता। कठिन व खौफ भरे इस दौर में मेरे पार्टी के अनेक नेतृत्वकारी साथी, परिवार व रिश्तेदार, दोस्त व शुभचिंतक लगातार याद करते रहे, हौंसला देते रहे मार्गदर्शन करते रहे। आप सबका धन्यवाद।

मैं बहुतों के फोन नहीं सुन सका, फोन सुनती बार मेरी सांस फूल जाती थी। पिछले 12 दिन में अधिकांश समय मेरा फोन स्विच ऑफ ही रहा। ऑन होने पर भी मैं कई फोन अटैंड नहीं कर सका। कुछ ने वॉट्सअप में शुभकामनां भेजी होगी, जिनको मैं पढ़ नहीं पाया हूं। अभी भी फोन में बात करती बार प्रॉब्लम रहती है। शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी है, पूरी तरह ठीक होने में अभी वक्त लगेगा। माफी चाहता हूं, कॉफी समय से जनमानस से दूर हूं व जन-गतिविधियों से दूर हूं।

आप सब अपना ख्याल रखें। कोरोना से बचाव के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण बहुत ही जरूरी है। सच में ही मैंने मौत को बहुत करीब से महसूस किया है। सांसों का टूटना ही तो मौत है। लगभग ऐसी स्थित तक पहुंच गया था मैं। इस भयावह मंजर तक पहुंचने पर भी मुझे न कोई यमदूत नजर आए, न ही देवदूत। जब मुझे लगता था कि सांस ही नहीं आ रही और गंभीर बेचैनी होती थी तो पीड़ा में दो शब्द ही मेरे मुंह से निकलते थे.. ‘हाय अम्मा! हाय अम्मा! ऐसा भी नहीं था कि मैं उस वक्त मां को पुकारना चाहता था, लेकिन शायद ये सबसे नेचुरल शब्द रहे होंगे जो स्वत: ही मुख से निकल जाते थे।

मेरे भाई, बहनों व नजदीकी रिश्तेदारों के साथ-साथ डॉक्टर ओंकार शाद, संजय चौहान, फालमा चौहान, विजयेन्द्र मेहरा, संजीव खजूरिया हर रोज मुझे गाईड करते रहे व हौंसला देते रहे। राकेश सिंघा, डॉक्टर काश्मीर सिंह ठाकुर, डॉक्टर कुलदीप सिंह तनवर, प्रेम गौतम, सत्यवान व भूपेंद्र सिंह, राजेश, सुरेश, चौंतड़ा से साथी रविन्दर, रणजीत राणा का भी धन्यवाद जो समय-समय पर हाल-चाल जानते रहे व महत्वपूर्ण सुझाव तथा गाइडैंस देते रहे। साथी संजय जमवाल का धन्यवाद जिन्होंने पहले दिन ही मेरे कहने पर पहले दिन ही बाजार से पल्स ऑक्सीमीटर लाकर उपलब्ध करवाया तथा कोई भी सामान लाने बारे बार-बार पूछते रहे। साथी अर्जुन बडवाल का भी धन्यवाद जिन्होंने बाजार से हर जरूरी सामान खरीदकर घर पहुंचाया।

टिक्कर से हमारे अज़ीज़ प्रदीप धरवाल का बहुत -बहुत धन्यवाद, जिन्होंने मेरे मना करने के बावजूद मंडी व नेरचौक से कल शाम को दो इम्यूनिटि बूस्टर किट खरीद कर हम तक पहुंचाई और पैसे लेने से भी साफ इंकार कर दिया। बोले चाचू जी क्या आपके लिए हम इतना सा भी नहीं कर सकते क्या? उनकी वाइफ भी पिछले दिनों कोविड-19 पॉजिटिव आ गई थीं।

मेरी बहन चंडीगढ़ से यहां आने के लिए तैयार हो गई थी, ताकि रोटी बनाने व सेवा करने में मदद कर सके, लेकिन मैंने अपनी वाइफ को कहा कि उनको मना कर दो, क्योंकि हम अपने साथ-साथ बाकि रिश्तेदारों को खतरे में नहीं डालेंगे। मेरी भतीजी का फोन आया था कि यदि बुआ नहीं आ रही है तो दादू-दादी को मैं कुछ दिन के लिए अपने पास ले जाऊं। लेकिन अपनी जिंदगी को आसान बनाने के लिए दूसरों के लिए भी रिस्क पैदा करना कभी भी मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं रहा है। तो मैंने मना कर दिया।

कई घंटों में सुस्ता-सुस्ता कर इतना लिख पाया हूं। जिंदगी का भरोसा नहीं कब सांसें कमजोर पड़ जाएं। इसलिए लिख कर भावनाओं का गुब्बार निकाल दिया।

आप सब स्वस्थ रहें। यही मेरी कामना है। किसी को भी कोरोना न हो। गलती से हो भी जाए तो ऐसी हालत न हो जैसी मेरी हुई। लेकिन मेरी कामना या दुआ से ज्यादा आपकी समझदारी व सावधानी आपको सुरक्षित रखेगी।

आखिरी बात! कुछ लोग ऐसे उपदेश देते हैं कि मुझे भी कोरोना हुआ था और इससे कुछ नहीं होता। ऐसे उपदेशों से बचें। मुझे लगता है कि कोरोना हर व्यक्ति के शरीर में अलग-अलग व्यवहार करता है। हौंसला व जीने की चाह जरूरी है, उतना ही जरूरी है आराम और सिर्फ आराम। कोरोना में एग्जरशन से परहेज करें।

सरकार व उसके तंत्र से उम्मीद न ही लगाएं तो बेहतर है। पॉजिटिव आने के बाद से अब तक किसी ने हाल चाल तक नहीं पूछा है। हालांकि मैंने पॉजिटिव आते ही अस्पताल में भी कहा था कि मुझे सांस लेने में भी दिक्कत है और मुझ से खड़ा भी नहीं रहा जा रहा था और रिपोर्ट आने से पहले मैं एक साइड के बैंच में बिना उसे हाथ लगाये बैठा था और जैसे रिपोर्ट पॉजिटिव आने का पता चला तो बैंच छोड़कर मैं अस्पताल के बाहर कोने में सड़क के फर्श पर ही बैठ गया था। मैं 13 तारीख को दिए सैंपल में पॉजिटिव आया था। सोमवार 16 तारीख को मेरी पत्नी व बेटे ने सैंपल दिया तो वाइफ भी पॉजिटिव आई। 17 तारीख को सुबह मैंने अस्पताल में फोन कर निवेदन किया कि मेरे माता-पिता बैड रिडन हैंं, उनको बाहर ले जाना हो तो सीढ़ियों से मैं ही उनको पीठ पर उठा कर ले जाता हूं, और क्योंकि मैं पॉजिटिव हूं तो मैं अपने माता-पिता के नजदीक नहीं जा सकता। इस लिए इनका सैंपल लेने के लिए किसी को घर भेज दो। मैंने ये भी बताया कि पैदल भी कोई आयेंगे तो हमारे रेजिडेंस तक पहुंचने में 7 मिनट से ज्यादा टाईम नहीं लगेगा। मुझे अस्पताल से जवाब मिला कि अभी सरकार का ऐसा कोई ऑर्डर नहीं है कि किसी के घर जाकर सैंपल लेना है। मुझे से ज्यादा बात नहीं हो पाती थी तो मैंने ज्यादा कुछ नहीं बोला।

यदि मैं ठीक होता तथा किसी और के लिए सरकारी तंत्र ने ऐसी बात कही होती तो मैं निश्चित ही ऐसे तंत्र व ऐसे प्रशासन को ताला लगाकर बाहर धरने पर बैठ जाता। सरकार व सरकार के तंत्र ने मेरी व मेरे परिवार की कोई सुध नहीं ली, तो कोई बात नहीं, लेकिन प्रदेश के मेरे असंख्य बुजुर्गों, बहनों, भाइयों व बच्चों की सुध जरूर लेते रहो।

-कुशाल भारद्वाज, नेता CPIM जोगिंदर नगर
इनके व्यक्तिगत अनुभव fb पोस्ट पर आधारित