प्राइवेट विश्वविद्यालयों के 17 में से 10 VC अयोग्य करार; सभी को हटाने के आदेश

हिमाचल प्रदेश में निजी विश्वविद्यालयों के अच्छी और गुणवत्ता वाली शिक्षा के दावे हवा हवाई होते नजर आ रहे है। जहां वाइस चांसलर ही अपने पद की योग्यता को पूरा नही करते उन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई किस स्तर की होगी? यह एक समझने वाली बात है। सरकार पालिसी बनाती है शिक्षण संस्थान लूप होल ढूंढते है और मनमानी करते है। फिर चाहे वह प्राइवेट स्कूल हो या विश्वविद्यालय। सबसे हैरानी की बात यह है कि यह वाइस चांसलर यूजीसी द्वारा तय शैक्षणिक योग्यता नही रखते और वाइस चांसलर नियुक्ति हो गए और सालों से विश्वविद्यालय चला भी रहे है।

मानव भारती यूनिवर्सिटी को जांच के चलते यह कार्यवाही की गई। अन्यथा सरकार और प्रशासन गहरी नींद सोया था। किसी को देश के भविष्य की फिक्र ही नही थी। जब मानव भारती विश्वविद्यालय का फर्जी डिग्री का मामला उठा तो निजी संस्थान नियामक आयोग नींद से जागा। एक हाई पावर कमेटी बनाई गई और सभी निजी विश्वविद्यालयों की जांच की गई। जांच में एमएमयू के वीसी विपिन सैणी, एपीजी यूनिवर्सिटी शिमला के कुलपति रमेश कुमार चौधरी, इटरनल विवि के वीसी देविंद्र कुमार, इक्फाई के एचपी सिंह, इंडस यूनिवसिटी के सुब्रह्मयण्म रमन अय्यर, अर्नी यूनिवर्सिटी के संजीव कुमार, चितकारा यूनिवर्सिटी के वीसी, बाहरा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अरूण शर्मा अयोग्य पाए गए। अरूण शर्मा पूर्व आईएएस अधिकारी रहे हैं और शिक्षा सचिव भी रह चुके है। इनके अलावा शुलिनी विवि के वाइस चांसलर पीके खोसला और बद्दी यूनिवर्सिटी के कुलपति तिलक राज भारद्वाज की उम्र ज्यादा पाई गई है।

इस जांच में महाराज अग्रसेन यूनवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर आरके गुप्ता, आईसी विवि की वीसी प्रो.अंजु सक्सेना, अभिलाषी विवि के प्रो.एचएस बनयाल,जेपी विवि के प्रो. विनोद कुमार, श्री सांई विवि के प्रो.राजेंद्र सिंह राणा और कैरियर प्वाइंट यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो.करतार सिंह वर्मा योग्य पाए गए है।

आयोग का कहना है कि उनके पास दो विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर के खिलाफ शिकायत आई थी उसी शिकायत के आधार पर यह कार्यवाही की गई है। कमेटी ने 10 दिसम्बर तक सभी अयोग्य वाइस चांसलर को हटाने के आदेश दिए है।